छत्तीसगढ में स्वयं सहायता समूह- बैंक लिंकेज कार्यक्रम के अंतर्गत सूक्ष्म वित्त की प्रवृत्ति एवं ग्रामीण विकास
डाॅ. सुनील कुमार कुमेटी1, डाॅ. भारती सिंह2
1सहायक प्राध्यापक, अर्थशास्त्र अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (छ.ग.)
2सहायक प्राध्यापक (संविदा), अर्थशास्त्र अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (छ.ग.)
सारांश
लघु वित्त संस्थाओं ने पारंपरिक बैंकिग तंत्र द्वारा वंचित ग्राहकों को सेवा प्रदान करने के प्रति एक साझा वचन बद्धता व्यक्त की है। मांग की कुशलता पूर्वक पूर्ति करना तथा ग्राहकों को सरलता से समझ आने वाली सेवाएं उपलब्ध करना ही लघु वित्त की सफलता की कुंजी है। इसी आधार पर बांग्लादेश, बोलिविया, इंडोनेशिया जैसे देशों में कार्यरत् संस्थाओं ने सिद्ध कर दिया कि गरीबों को मांग आधारित वित्तीय सेवाएं प्रदान कर गरीबी के विरूद्ध निर्णायक लड़ाई लड़ी जा सकतीे है। आजादी के बाद भारत के सामने जो चुनौतियां थी उनमें सबसे बड़ी चुनौती थी ग्रामीणों के आधारभूत जीवन स्तर में सुधार के लिए उन्हंे आवश्यक पूंजी उपलब्ध कराना। पिछले कुछ समय से ग्रामीण भारत में लघु ऋण कार्यक्रम के रूप में स्वयं सहायता समूह प्रचलित हुए हैं। इन स्वयं सहायता समूहों की खासियत यह है कि इनमें से लगभग 92 प्रतिशत समूहों का संचालन महिलाओं द्वारा किया जा रहा है। स्वयं सहायता समूहों द्वारा ग्रामीण विकास की सहायता से गरीबी उन्मूलन के साथ महिला सशक्तिकरण का भी कार्य कर रहे हैं। इन स्वयं सहायता समूहों की अवधारणा गरीब परिवारों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने और उन्हें किसी लघु उद्यम से जोड़ने की है। आज जरूरत इस बात की है कि इन स्वयं सहायता समूहों को पर्याप्त प्रशिक्षण दिया जाए जिससे वे अपनी गतिविधियां व्यवस्थित तरीके से चला सकंे और लघु ऋण व्यवस्था सहीं मायने में उनका जीवन स्तर ऊपर उठाने में सहायक बन सके।
शब्दकुंजी - नाबार्ड, सूक्ष्म वित्त, स्वयं सहायता समूह, ग्रामीण विकास।
1. प्रस्तावनाः
ग्रामीण विकास की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए महात्मा गांधीजी ने कहा था कि ’’यदि भारत को जीवित रखना है तो सबसे निचले स्तर से कार्य शुरू करना होगा, यदि इसकी स्थिति खराब होगी तो बाकि के सभी स्तरों पर किया गया कार्य व्यर्थ होगा।’’ ग्रामीण विकास के लिए केवल आर्थिक संवृद्धि ही नहीं बल्कि आर्थिक संवृद्धि का न्यायोचित वितरण भी आवश्यक है। ग्रामीण विकास में उन सभी कार्यक्रमों को शामिल किया जाता है जो मानव जीवन के सभी पहलूओं को छूते हैं जैसे- कृषि एवं संबद्ध क्रियाएं, सिंचाई, संचार, स्वास्थ्य, पूरक रोजगार, आय, आवास, शिक्षण एवं प्रशिक्षण तथा सामाजिक कल्याण। लघु वित्त संस्थाओं ने ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक बैंकिग तंत्र से वंचित ग्राहकों को सेवा प्रदान करने के प्रति एक साझा वचन बद्धता व्यक्त की है। निम्न आय वर्ग के लोगों को अधिकाधिक वित्तीय सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से नाबार्ड द्वारा सूक्ष्म वित्त के अंतर्गत स्वयं सहायता समूह- बैंक लिंकेज कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है। नाबार्ड द्वारा प्रायोजित स्वयं सहायता समूहों को लघु ऋण सुविधा उपलब्ध करा कर आर्थिक रूप से सक्षम बनाने का प्रयास कर रही है। लघु ऋण कार्यक्रम भारत में ही नही बल्कि अधिकतर विकासशील और गरीब देशों में बड़ी तेजी से अपना दायरा बढ़ा रहे हंै। छत्तीसगढ भी इन सबसे अछूता नही है यहां भी लघु ऋण व्यवस्था के अंतर्गत नाबार्ड द्वारा स्वयं सहायता समूहों को वित्तीय सुविधाएं उपलब्ध कर गरीबी उन्मूलन एवं ग्रामीण विकास हेतु प्रयास किया जा रहा है। इन स्वयं सहायता समूहों की खासियत यह है कि इनमें से अधिकतर समूहों को महिलाएं संचालित कर रही हंै। लगभग 92 प्रतिशत स्वयं सहायता समूह सिर्फ महिलाओं के द्वारा संचालित हो रहे हंै। इसप्रकार स्वयं सहायता समूह महिला सशक्तिकरण का भी कार्य कर रहे हंै। ग्रामीण भारत में अधिकतर लघु ऋण कार्यक्रम समूहगत ढ़ाॅ़चों के जरिये क्रियान्वित किये जाते हैं जिन्हे स्वयं सहायता समूह के नाम से जाना जाता है। इस समय भारत में 79.03 लाख स्वयं सहायता समूह के जरिये 10.10 करोड परिवार लाभान्वित हो रहे हैं। इन स्वयं सहायता समूहों की मार्च 2016 तक कुल जमा ₹ 13,691.39 करोड़, कुल ऋण ₹ 37,286.9 करोड़ तथा ₹ 57,119.2 करोड़ ऋण बकाया है। छत्तीसगढ़ में नाबार्ड द्वारा प्रायोजित 1,60,461 स्वयं सहायता समूहों की बैंकों में बचत खाता है जिनमें ₹ 16046.37 लाख जमा है।
2. अध्ययन का उद्देश्यः
प्र्रस्तुत अध्ययन का मुख्य उद्देश्य नाबार्ड द्वारा सूक्ष्म वित्त के अंतर्गत स्वयं सहायता समूहों को बैंकों द्वारा उपलब्ध वित्तीय सुविधाओं के प्रभावों का अध्ययन करना है। जो निम्नांकित हैं -
1ण् सूक्ष्म वित्त के अंतर्गत नाबार्ड द्वारा संचालित स्वयं सहायता समूह - बैंक लिंकेज कार्यक्रम के अंतर्गत उपलब्ध वित्तीय सुविधाओं की प्रवृत्ति का अध्ययन करना।
2ण् सूक्ष्म वित्त के अंतर्गत नाबार्ड द्वारा संचालित स्वयं सहायता समूह - बैंक लिंकेज कार्यक्रम से लाभान्वित समूहों की बचत प्रवृत्ति का अध्ययन करना।
3ण् सूक्ष्म वित्त के अंतर्गत नाबार्ड द्वारा संचालित स्वयं सहायता समूह - बैंक लिंकेज कार्यक्रम के अंतर्गत बैंकों की गैर निष्पादन आॅस्तियों (एनपीए) एवं ऋण वितरण पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करना।
3. परिकल्पनाएंः
सूक्ष्म वित्त से संबंधित शोध साहित्यों के अध्ययन एवं मूलभूत जानकारी के आधार पर प्रस्तुत अध्ययन की निम्नांकित शोध परिकल्पनाएं हैं -
भ्0रू सूक्ष्म वित्त के अंतर्गत नाबार्ड द्वारा संचालित स्वयं सहायता समूह- बैंक लिंकेज कार्यक्रम से लाभान्वित समूहों की बचत प्रवृत्ति में वर्ष दर वर्ष सार्थक वृद्धि नहीं हो रही है।
भ्1रू सूक्ष्म वित्त के अंतर्गत नाबार्ड द्वारा संचालित स्वयं सहायता समूह- बैंक लिंकेज कार्यक्रम से लाभान्वित समूहों की बचत प्रवृत्ति में वर्ष दर वर्ष सार्थक वृद्धि हो रही है।
भ्0रू सूक्ष्म वित्त के अंतर्गत नाबार्ड द्वारा संचालित स्वयं सहायता समूह- बैंक .लिंकेज कार्यक्रम के अंतर्गत बैंकों की गैर निष्पादन आॅस्तियों (एनपीए) एवं ऋण वितरण के मध्य सार्थक सहसम्बन्ध नहीं है।
भ्1रू सूक्ष्म वित्त के अंतर्गत नाबार्ड द्वारा संचालित स्वयं सहायता समूह- बैंक लिंकेज कार्यक्रम के अंतर्गत बैंकों की गैर निष्पादन आॅस्तियों (एनपीए) एवं ऋण वितरण के मध्य सार्थक सहसम्बन्ध है।
4. शोध प्रविधिः
भारतीय परिदृश्य में तेजी से उभरते राज्यों में से एक छत्तीसगढ़ राज्य जो अपने निर्माण के 16 वर्ष पूर्ण कर चूका है, में नाबार्ड द्वारा संचालित स्वयं सहायता समूह- बैंक लिंकेज कार्यक्रम की सहायता से राज्य को उपलब्ध वित्तीय सुविधाओं का निम्न आय वर्ग एवं ग्रामीण विकास पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करने के उद्देश्य पर आधारित प्रस्तुत शोध पत्र द्वितीयक समंकों पर आधारित है। द्वितीय समंकों का संकलन नाबार्ड द्वारा प्रकाशित ’भारत में सूक्ष्म वित्त की स्थिति’ नामक शीर्षक से प्रकाशित वार्षिक प्रतिवेदनों से लिया गया है। इसके अतिरिक्त द्वितीयक समंक सरकार एवं गैर-संरकारी संगठनों द्वारा प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं से भी संकलित किये गये हैं। साथ ही शोध पत्र को प्रभावपूर्ण बनाने के लिए सांख्यिकीय विधियों एवं रेखाचित्रों का भी प्रयोग किया गया है।
5. आंकड़ों का विश्लेषणः
नाबार्ड द्वारा सूक्ष्म वित्त बैंक संयोजन कार्यक्रम के अंतर्गत छत्तीसगढ़ राज्य में वर्ष 2006-07 से 2015-16 की अवधि में उपलब्ध कराए गये वित्तीय सुविधाओं का अध्ययन किया गया है।
1. बचत प्रवृत्तिः
उपरोक्त दस वर्षों की अवधि में बचत प्रवृत्ति के अध्ययन से ज्ञात होता है कि छत्तीसगढ में 31 मार्च 2016 को बैंकिंग क्षेत्र में नाबार्ड द्वारा प्रायोजित कुल 160461 स्वयं सहायता समूहों के बचत खाता में रू. 16,046.37 लाख जमा है, जबकि मार्च 2007 को इनमें 58,213 स्वयं सहायता समूहों के कुल रू. 2874.78 लाख जमा थे। उपरोक्त 10 वर्षों की अवधि में स्वयं सहायता समूहों की संख्या में संयुक्त वार्षिक वृद्धि दर 11.93 प्रतिशत की तुलना में बचत राशि में 21.05 प्रतिशत की संयुक्त वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की गई। जो स्वयं सहायता समूहों की बचत क्षमता में वृद्धि का प्रतीक है। बैंकवार अध्ययन से ज्ञात होता है कि उपरोक्त अवधि में हुए समग्र वृद्धि में सर्वाधिक योगदान क्षेत्रीय ग्रामीण बैंका का है। उपरोक्त आलोच्य अवधि में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों से जुड़ने वाले स्वयं सहायता समूहों की संख्या में संयुक्त वृद्धि दर 10.60 प्रतिशत रही तथा बचत दर में 19.85 प्रतिशत की संयुक्त वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई जो नाबार्ड द्वारा वित्त पोषित अन्य बैंकों की तुलना में सर्वाधिक है। इसके उपरांत वाणिज्यिक बैंकों में स्वयं सहायता समूहों की संख्या में 3.30 एवं बचत दर में 24.63 प्रतिशत की संयुक्त वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की गई है।
सारणी 1 - छत्तीसगढ़ में सूक्ष्म वित्त क¢ अन्तर्गत बैंक¨ं क¢ पास स्वयं सहायता समूह¨ं की बचत (राशि ₹ लाख में)
बचत की दर में वृद्धि क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की 19.85 की तुलना में वाणिज्यिक बैंकों की बचत प्रवृत्ति में वृद्धि दर 24.63 प्रतिशत संयुक्त वार्षिक वृद्धि दर अधिक रही है। जबकि उक्त अवधि में बैंकों से जुड़ने वाले स्वयं सहायता समूहों की संख्या में संयुक्त वार्षिक वृद्धि दर 3.30 प्रतिशत की तुलना में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों में 10.60 प्रतिशत दर्ज की गई। जबकि इसी अवधि में सहकारी बैंकों का प्रदर्शन नकारात्मक रही है। स्वयं सहायता समूहों की संख्या में 0.02 एवं बचत राशि में 0.50 प्रतिशत की नकारात्मक संयुक्त वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई। वित्त वर्ष 2015-16 में समस्त जमाओं ₹ 16046.37 लाख में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का योगदान सर्वाधिक 63.14 प्रतिशत (₹ 10131.00 लाख) तथा सबसे कम योगदान सहकारी बैंकों का मात्र 5.30 प्रतिशत (₹ 850.52 लाख) है। इस अवधि में वाणिज्यिक बैंकों का योगदान 31.56 प्रतिशत (₹ 5064.85 लाख) है।(सारणी -1)
2. ऋणों का वितरणः
छत्तीसगढ में सूक्ष्म विŸा के अंतर्गत नाबार्ड द्वारा प्रायोजित स्वयं सहायता समूहों को विभिन्न बैंकों से ऋण सुविधा उपलब्ध कराया जा रहा है ताकि से वित्तीय सुविधाएं प्राप्त कर आर्थिक रूप से सक्षम बन सकें। उपलब्ध ऋण सुविधाओं के अध्ययन से ज्ञात होता है कि सभी व्यावसायिक बैंकों द्वारा इन स्वयं सहायता समूहों को ऋण सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही है। 2006-07 से 2015-16 की अवधि में इन बैंकों द्वारा उपलब्ध ऋण सुविधाओं में 23.50 प्रतिशत एवं स्वयं सहायता समूहों की संख्या में 4.74 प्रतिशत की संयुक्त वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई। ऋण राशि उपलब्ध कराने में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, वाणिज्यिक बैंक एवं सहकारी बैंकों में क्रमशः 8.85, 8.74 एवं 6.46 प्रतिशत संयुक्त वार्षिक वृद्धि दर रही है। उपरोक्त अवधि में बैंकों से जुड़ने वाले स्वयं सहायता समूहों की संख्या में संयुक्त वार्षिक वृद्धि दर 2.03 प्रतिशत वाणिज्यिक बैंकों की सकारात्मक रही है शेष दोनों बैंकों में इनकी संख्या में गिरावट दर्ज की गई है। क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों से जुड़ने वाले स्वयं सहायता समूहों की संख्या में 4.63 प्रतिशत एवं सहकारी बैंकों में 6.89 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। वर्ष 2006-2007 में 7309 स्वयं सहायता समूहों को रुपयें 1441.73 लाख राशि ऋण के रूप में वितरण किया गया था। वर्ष 2015-2016 में 11085 स्वयं सहायता समूहों को रु. 9636.05 लाख राशि बैंक ऋण के माध्यम से संवितरित किया गया जिसमें सर्वाधिक योगदान वाणिज्यिक बैकों का रहा। वाणिज्यिक बैकों द्वारा वर्ष 2007-2008 में 5635 स्वयं सहायता समूहों को रु. 3971.26 लाख तथा वर्ष 2015-2016 में स्वयं सहायता समूहों 6616 स्वयं सहायता समूहों को 6551.84 लाख ऋणों का वितरण किया गया। इनके पश्चात् क्षेत्रीय ग्रामीण बैकों द्वारा वर्ष 2006-2007 में 4934 स्वयं सहायता समूहों को ₹ 1042.15 लाख तथा वर्ष 2015-2016 में 3220 स्वयं सहायता समूहों को रु. 2235.00 लाख के ऋण वितरण किये गये। जबकि छŸाीसगढ़ में सहकारी बैकों द्वारा सूक्ष्म विŸा के अंतर्गत वर्ष 2006-2007 में 2375 स्वयं सहायता समूहों को रु. 399.58 लाख तथा वर्ष 2015-2016 में 1249 स्वयं सहायता समूहों को रु. 849.21 लाख ऋणों का वितरण किया गया। इसप्रकार छŸाीसगढ़ में सूक्ष्म विŸा के अंतर्गत बड़े पैमाने पर ऋणों का वितरण किया गया है।(सारणी -2)
3. बकाया बैंक ऋणः
छत्तीसगढ में मार्च 2006 तक 18960 स्वयं सहायता समूहों पर रू. 3800.57 लाख के बकाया बैंक ऋणों की तुलना में मार्च 2016 को कुल 81328 स्वयं सहायता समूहों पर रू. 29843.38 लाख के बकाया ऋण थें। उपरोक्त दस वर्षों की अवधि में स्वयं सहायता समूहों के समक्ष बकाया बैंक ऋणों के अंतर्गत स्वयं सहायता समूहों की संख्या में 17.56 प्रतिशत एवं बकाया ऋण की राशि में 25.73 प्रतिशत की संयुक्त वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई। यह वृद्धि दर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों द्वारा बड़े पैमाने पर ऋणों के वितरण एवं समय पर वसूली नहीं होने के कारण है। शेष दो बैंकों में बकाया ऋण राशि में नकारात्मक वृद्धि रही है। वाणिज्यिक बैंकों ने ऋणों की वसूली में सकारात्मक प्रदर्शन करते हुए स्वयं सहायता समूहों की संख्या में 11.28 प्रतिशत एवं बकाया ऋण की राशि में 9.28 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। इसी प्रकार सहकारी बैंकों ने भी बकाया बैंक ऋण राशि के वसूली में सकारात्मक वृद्धि दर्ज की है। स्वयं सहायता समूहों की संख्या में 7.27 प्रतिशत एवं बकाया ऋण रांिश में 0.95 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है जो वाणिज्यिक एवं सहकारी बैंकों द्वारा ऋण वितरण के पूर्व ऋणों के जोखिम के संबंध में अतिरिक्त सतर्कता बरतने से समय पर ऋणों की वसूली हो पा रही है। बकाया बैंक ऋण के संबंध में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के प्रदर्शन में सुधार करने की आवश्यकता है। क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को स्वयं सहायता समूहों को ऋण वितरण से पूर्व उनकी कार्य कुशलता एवं कार्यक्षमता का आकलन कर ऋणों का वितरण करना चाहिए ताकि समय पर ऋणों की वापसी हो सके।(सारणी-3)
4. गैर-निष्पादन आॅस्तियां
छत्तीसगढ़ में नाबार्ड द्वारा प्रायोजित स्वयं सहायता समूह-बैंक लिंकेज कार्यक्रम के अंतर्गत स्वयं सहायता समूहों की विभिन्न बैंकों से उपलब्ध कराये गये ऋण के रूप में वित्तीय सुविधा की समय पर भुगतान की स्थिति के अध्ययन से ज्ञात होता है कि सभी बैंकों द्वारा स्वयं सहायता समूहों को अपने उत्थान तथा किसी लघु उद्यम से जोड़ने के उद्देश्य से बड़े पैमाने पर ऋण सुविधा उपलब्ध करायी गयी है। ये स्वयं सहायता समूह ऋण की राशि से कार्यकुशलता में वृद्धि करते हुए ऋणों का भुगतान समय पर कर रहें हैं जिसके कारण एनपीए के प्रतिशत् में कमी हो रही है। यह कमी सभी वर्षों में समान न होकर कुछ वर्षों में वृद्धि भी हुई है। पिछले तीन वर्षों में एनपीए के स्तर में निरंतर कमी देखने को मिली है जो 12.44 प्रतिशत से कम होकर 9.59 प्रतिशत है। बैंकवार गैर-निष्पादन आॅस्तियों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि सार्वजनिक क्षेत्र के वाणिज्यिक बैंकों की गैर-निष्पादन आॅस्तियों (एनपीए) की सर्वाधिक राशि ₹ 1664.75 लाख जो कुल वितरित ऋण का 17.94 प्रतिशत तथा सबसे कम निजी क्षेत्र के वाणिज्यिक बैंकों की ₹ 2.89 लाख जो वितरित बैंक ऋण का 0.21 प्रतिशत है। सहकारी बैंक एवं क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों द्वारा वितरित ऋण में भी एनपीए की स्थिति क्रमशः 14.91 एवं 5.95 प्रतिशत है जिसका बैंकों के लिए भविष्य में पूंजी निर्माण में नकारात्मक प्रभाव हो सकता है। किन्तु विगत् 3 वर्षों के एनपीए के अध्ययन से ज्ञात होता है कि सभी बैंकों में एनपीए की राशि एवं दर में गिरावट आ रही है जो बैंकों की ऋण वितरण में सजगता एवं वसूली में कुशलता का घोतक है तथा साथ ही स्वयं सहायता समूहों की कार्यकुशलता में हो रही वृद्धि का परिणाम हो सकता है। वर्तमान में स्वयं सहायता समूह ग्रामीण क्षेत्रों में निवारत् महिलाओं के लिए अर्थोर्पाजन का प्रमुख स्रोत बन कर महिला सशक्तिकरण एवं आर्थिक सक्षमता का परिचायक बनते जा रही है। इन समूहों में जुड़ने से महिलाओं में जागरूकता, शिक्षा, स्वास्थ्य, आत्मनिर्भरता में वृद्धि हो रही है। यह प्रगति उनकी कार्यशैली एवं समय पर बैंकों से लिए गए ऋणों के भुगतान के रूप में देखनें को मिल रही है जिससे बैंक एवं स्वयं सहायता समूह दोनों लाभान्वित होकर ग्रामीण विकास में सकारात्मक भूमिका अदा कर रहे हैं ।
6. परिकल्पना परीक्षण -
भ्0 त्र सूक्ष्म वित्त के अंतर्गत नाबार्ड द्वारा संचालित स्वयं सहायता समूह- बैंक लिंकेज कार्यक्रम से लाभान्वित समूहों की बचत प्रवृत्ति में वर्ष दर वर्ष सार्थक वृद्धि नहीं हो रही है।
भ्1 त्र सूक्ष्म वित्त के अंतर्गत नाबार्ड द्वारा संचालित स्वयं सहायता समूह- बैंक लिंकेज कार्यक्रम से लाभान्वित समूहों की बचत प्रवृत्ति में वर्ष दर वर्ष सार्थक वृद्धि हो रही है।
सारणी क्र. 5 स्वयं सहायता समूहों की संख्या एवं बचत प्रवृत्ति के मध्य सहसम्बन्ध गुणांक
टंतपंइसम छनउइमत ब्वततमसंजपवद ब्वमििपबपमदज च अंसनम तमउंता
ैंअपदह ।उवनदज 11 0ण्668 0ण्025 ै
छवण् व िैभ्ळे
’ ै त्र ैपहदपपिबंदज ंज 5: समअमस व िेपहदपपिबंदबमण्
निर्वाचनः
उपरोक्त सारणी के अनुसार सूक्ष्म वित्त के अंतर्गत नाबार्ड द्वारा संचालित स्वयं सहायता समूह- बैंक लिंकेज कार्यक्रम से लाभान्वित समूहों की संख्या एवं इनकी बचत प्रवृत्ति के बीच स्वातंत्र्य कोटियों की संख्या 10 पर सहसम्बन्ध गुणांक 0.668 है एवं पी-मूल्य 0.025 है। अर्थात् दोनों चरों के बीच अंतर महत्वपूर्ण है। इस प्रकार हमारी शून्य परिकल्पना अस्वीकार की जाती है जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि सूक्ष्म वित्त के अंतर्गत नाबार्ड द्वारा संचालित स्वयं सहायता समूह- बैंक लिंकेज कार्यक्रम से लाभान्वित समूहों की बचत प्रवृत्ति में वर्ष दर वर्ष सार्थक वृद्धि हो रही है। जो इन स्वयं सहायता समूहों की आय एवं बचत प्रवृत्ति में वृद्धि कर इन्हें आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास कर रही है।
2. भ्0 त्र सूक्ष्म वित्त के अंतर्गत नाबार्ड द्वारा संचालित स्वयं सहायता समूह- बैंक .लिंकेज कार्यक्रम के अंतर्गत बैंकों की गैर निष्पादन आॅस्तियों (एनपीए) एवं ऋण वितरण के मध्य सार्थक सहसम्बन्ध नहीं है।
भ्1 त्र सूक्ष्म वित्त के अंतर्गत नाबार्ड द्वारा संचालित स्वयं सहायता समूह- बैंक लिंकेज कार्यक्रम के अंतर्गत बैंकों की गैर निष्पादन आॅस्तियों (एनपीए) एवं ऋण वितरण के मध्य सार्थक सहसम्बन्ध है।
निर्वाचनः
उपरोक्त सारणी के अनुसार सूक्ष्म वित्त के अंतर्गत नाबार्ड द्वारा संचालित स्वयं सहायता समूह- बैंक लिंकेज कार्यक्रम के अंतर्गत बैंकों की गैर निष्पादन आॅस्तियों (एनपीए) एवं ऋण वितरण के मध्य स्वातंत्र्य कोटियों की संख्या 8 पर सहसम्बन्ध गुणांक 0.009 है एवं सार्थकता मूल्य 0.982 है जो महत्वपूर्ण नहीं है। अर्थात् शून्य परिकल्पना स्वीकार की जाती है कि बैंकों की गैर निष्पादन आॅस्तियों (एनपीए) एवं ऋण वितरण के मध्य सार्थक सहसम्बन्ध नही पाया गया है।
7. निष्कर्ष एवं सुझावः
भारत में आर्थिक विकास के सतत् प्रयास के बावजूद ग्रामीण और शहरी विकास के बीच आर्थिक विषमता आज भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रही है। नियोजित आर्थिक विकास और और औद्योगीकरण के फलस्वरूप नगरीय क्षेत्र विकास करते गये जबकि ग्रामीण क्षेत्र निरंतर पिछड़ते चले गये। कल्याणकारी संस्था के रूप में नाबार्ड द्वारा ग्रामीण विकास की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए देश के पिछड़े एवं सुविधा विहीन वर्ग की संवृद्धि हेतु एक सतत् एवं सघन प्रयास के रूप में स्वयं सहायता समूह- बैंक लिंकेज कार्यक्रम चलाया जा रहा है। नाबार्ड सूक्ष्म वित्त के क्षेत्र में शामिल सभी साझेदारों को भरपूर सहयोग प्रदान कर रहा है और वंचित वर्ग के लिए एक अच्छा मंच बना हुआ है। यह स्वयं सहायता समूहों को संवर्धित व विकसित करने के लिए स्वैच्छिक एजेसिंयों, बैंकरों, सामाजिक सरोकारों से जुड़े व्यक्तियों, अन्य औपचारिक व अनौपचारिक संस्थाओं तथा सरकारी संस्थाओं को भी प्रोत्साहित कर रहा है। इसके अतिरिक्त सूक्ष्म विŸा के अंतर्गत ग्रामीण एवं कृषि विकास हेतु ऋण प्रवाह सुनिश्चित करने में बैंकों का योगदान भी महत्वपूर्ण साबित हो रहा है। इन बैंकों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों मे कमजोर वर्गों को ऋण उपलब्ध कराकर उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने का प्रयास किया जा रहा है। आज जरूरत इस बात की है कि इन स्वयं सहायता समूहों को पर्याप्त प्रशिक्षण दिया जाए जिससे वे अपनी गतिविधियां व्यवस्थित तरीके से चला सकें और उपलब्ध सूक्ष्म विŸा की सुविधा सहीं मायने में इनका जीवन स्तर ऊपर उठाने में सहायक बन सके।
ग्रामीण ऋण व्यवस्था के स्वरूप में पिछले कुछ वर्षो से छत्तीसगढ़ में सकारात्मक परिवर्तन दिखाई दे रही है। किंतु अभी भी एक बड़ा वर्ग इन लाभों से वंचित है। आज जरूरत इस बात की है कि इस वंचित वर्ग को भी ये सुविधाएं उपलब्ध कराई जाए ताकि आम ग्रामीण जन को सूक्ष्म वित्त के अंतर्गत नाबार्ड द्वारा संचालित स्वयं सहायता समूह- बैंक लिंकेज कार्यक्रम के माध्यम से स्वरोजगार एवं आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के उद्देश्य से बड़े पैमाने पर उपलब्ध कराए जा रहे ऋणों का लाभ उठा कर अपने जीवन स्तर में सुधार कर सकें। तथा उस अंतिम व्यक्ति तक वित्तीय सुविधाएं सहजता से उपलब्ध हों, जिससे देश वित्तीय समावेशन की ओर अग्रसर हो सके।
8. संदर्भ सूचीः
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Received on 22.12.2017 Modified on 18.01.2018
Accepted on 30.01.2018 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Ad. Social Sciences. 2018; 6(1):01-08.